मैथिली में पूजा पथ करने का सबसे आसान तारिका है, मैथिली अनुवादित कथा वाली किताब या ग्रंथ उपयोग करना।दसरा तारिका है अपने बड़े बुजुराग का कहने के लिए अनुसर पूजा करना ! अगर आप मैथिली नहीं जनता या मैथिल नहीं है तो अकबर मिथिला आईये और यहां के पंडित जी से मैथिली पूजा पथ की जानकारी एल

 मैथिली भाषा की फिल्म ललका पाग मिथिला की स्त्रियों के त्याग, संस्कार और बलिदान पर आधारित है. वैसे, यह फिल्म पहले पीवीआर में प्रदर्शित हो चुकी है और पीवीआर में रिलीज होने वाली मैथिली की यह पहली फिल्म है।


रत्नेश शाह द्वारा निर्मित ‛ललका पाग’ नारी जीवन में होने वाले दमनात्मक घटनाओं से मन को झकझोर देने वाली फिल्म है। फिल्म की मुख्य भूमिका में नायक रोशन राज, मुख्य नायिका श्वेता वर्मा, सह-नायिका निर्मला एन गौतम, चरित्र भूमिका में प्रेमलता मिश्र प्रेम, उमाकांत, रामसेवक ठाकुर और कुन्दन हैं।

ललका पाग के संगीत-निर्देशक सीताराम सिंह हैं जबकि डायलॉग कुणाल ने लिखे हैं।

हृदयनारायण झा और कुणाल के लिखे गीतों को उदित नारायण झा, नंदिता चक्रवर्ती, पापिया गांगुली, अमृता दीक्षित ने स्वरबद्ध किया है। देश-विदेश में रहने वाले मैथिलीभाषियों के बीच इस फिल्म के गाने पहले ही हिट हो चुके हैं। इसे यूट्यूब पर सुना जा सकता है।

सेक्रेड फिग एन्टरटेनमेंट द्वारा प्रस्तुत मैथिली कहानी के शिखर पुरुष डॉ. राजकमल चौधरी की चर्चित कहानी ‛ललका पाग’ पर आधारित इस फिल्म के निर्देशक प्रशांत नागेंद्र हैं।

फिल्म की शूटिंग मिथिलांचल में हुई है। ‛ललका पाग’ बेमेल विवाह पर बनी एक फिल्म है जिसमें एमबीबीएस के छात्र राधाकांत की शादी उसके इच्छा के विपरीत तीरु से कर दी जाती है। कॉलेज में राधाकांत की गर्लफ्रैंड कामाख्या होती है।

तीरु परंपरागत चुलबुली मैथिल लड़की होती है, जो शादी के से पहले गांव में चुहलबाजी, हंसते-खेलने वाली लड़की थी।  शादी के बाद ससुराल को ससुराल नहीं समझ पाती है। वह पोखर में नहाती है, मिथिला की परंपरागत व्यवस्था के कारण ससुराल के लोग उसके बारे कई तरह की बातें करने लगते हैं, यही कारण था कि पति उसे छोड़ देता है।

राधाकांत की दूसरी शादी तय होती है, वह शादी के लिए जा रहा होता है तब रास्ते में तीरु मिलती है. वह कहती, ‛अहां आइ बड़ सुंदर लागि रहल छी, मन होइत अछि जे हम अहां स एक बेर फेर बियाह करितहुं..।’ (आप आज बहुत सुंदर लग रहे हैं, मन कर रहा है मैं एक बार फिर आपसे ब्याह करती)

राधाकांत झल्लाकर कहता है कि ‛एखन मजाक क बेर नै छै, पण्डित बजाय रहल अछि’ और वह घर से निकलने लगता है दरबाजे पर पहुंचने पर तीरु फिर पूछती है कि ‛अहां क माथा पर पाग कतो अछि’ और वह उसे ‛ललका पाग’ देते हुए कहती है, ‛इ तअ वैह पाग अछि जेकरा पहिर क आहां हमरा ओहिठाम आयल रहलहुँ. तखने सं हम एकर पूजा करैत छी.. इसे सुनकर राधाकांत… क्या रियेक्ट करता है और आगे क्या होता है.    

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 बचपन से ही थियेटर और फिल्म में काम करने का सपना और लगातार उस ओर प्रयास ने मोतीपुर प्रखंड के बरूराज की रहने वाली श्वेता आजाद को मंजिल दिला दी। अभी कुछ दिन पूर्व मैथिली भाषा में बनी फिल्म लव यू दुल्हिन से श्वेता को काफी ख्याति मिली। यह फिल्म दिल्ली के मल्टीप्लेक्स समेत अन्य शहरों में भी चली। 



ऐसे शुरू हुआ सफर

बचपन से ही श्वेता अपने पिता को थियेटर करता देख उस क्षेत्र में अपना कैरियर बनाने की सोचती। खुद से तैयारी भी करती रही, लेकिन शुरूआत में उन्हें मौका ही नहीं मिला। 2009 में श्वेता की शादी हो गई और इसके बाद वह दिल्ली चली गई। वहां एक बच्चे को भी जन्म दिया और इसके बाद भी निरंतर फिल्म और सिरियल के लिए प्रयास करती रही। पति का भी साथ मिला और 2015-16 में पहली बार महुआ चैनल पर परफैक्ट श्रीमति शो के लिए श्वेता को ऑफर मिला तो उसकी खुशी का ठिकाना नहीं रहा। इसके बाद इसी चैनल पर भौजी नंबर वन के सातवें सीजन में श्वेता फस्र्ट रनर अप भी रहीं। बिग गंगा चैनल पर बिग मेमसाहब शो में भी श्वेता ने काम किया। साथ ही गुनेहगार क्राइम सिरियल में भी श्वेता ने बखूबी अपना किरदार निभाई। इस दौरान प्रतिभा लगातार निखरती गई। 

  



नेपाल,  ऑस्कर अवॉर्ड तक पहुंचने का सपना बुनते हुए अभिनेत्री झराना थापा दो मैथिली फिल्मों में खुद को पेश कर रही हैं. झराना मैथिली भाषा की फिल्मों- 'अपान देश नेपाल' और 'माँ का दर्दा' से डेब्यू कर रहे हैं, जिसका निर्माण मंजीता सिने क्रिएशन प्राइवेट लिमिटेड विराटनगर के बैनर तले एक प्रमुख अभिनेता के रूप में किया जा रहा है। फिल्म प्रोजेक्ट की शुरुआत एक शुभ अवसर के बीच विराटनगर से की गई है।

झराना ने कहा कि वह दो मैथिली फिल्मों में काम करने का मौका पाकर बहुत खुश हैं। उसने दोनों फिल्मों को ऑस्कर पुरस्कार में लेने के उद्देश्य से काम करने की भी कसम खाई। “भाषा की बाधा के कारण कुछ चुनौतियाँ हो सकती हैं। हालाँकि, यह करने और सीखने जैसा है, ”झराना ने कहा, “मेरा उद्देश्य दोनों फिल्मों को स्क्रिप्ट को समझने और स्क्रिप्ट को तोते के बाद भी अभिनय करके ऊंचाई तक ले जाना है।” वह इससे पहले एक भोजपुरी फिल्म 'दीदी तोहर देवर दीवाना' में काम कर चुकी हैं जो सुपरहिट रही थी।

बिजय कामत दोनों फिल्मों में उनके सह-कलाकार होंगे जिनकी कहानियां सामाजिक और देशभक्ति के संदेशों से भरी हैं। 'मां का दर्द' के डायरेक्टर राजू चौधरी हैं। राज मणि चौधरी, बिजय कामत और भरत ठाकुर दोनों फिल्मों के निर्माता हैं। प्रोडक्शन यूनिट ने जानकारी दी है कि दोनों फिल्मों की शूटिंग चार महीने के अंदर पूरी कर ली जाएगी

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वट सावित्री व्रत केर कथा-


सावित्रीक जन्म सेहो विशिष्ट परिस्थिति मे भेल छल। कहल जाइत छैक जे भद्र देश केर राजा अश्वपति केँ कोनो संतान नहि छलन्हि। ओ संतान केर प्राप्ति हेतु मंत्रोच्चारणक संग प्रतिदिन एक लाख आहुति देलाह। अठारह वर्षों तक ई क्रम चलैत रहल। तेकर बाद सावित्रीदेवी प्रकट होइत वर देलनि जे ‘राजन! अहाँक घर मे एक तेजस्वी कन्या जन्म लेत।’ सावित्रीदेवी केर कृपा सँ जन्म लेबाक कारण कन्याक नाम सावित्री राखल गेल। कन्या पैघ भेली, ओ अत्यन्त रूपवती भेली, योग्य वर नहि भेटला पर दु:खी पिता हुनका स्वयं वर खोजबाक अधिकार देलनि। सावित्री तपोवन मे घूमैत-घूमैत ओतहि साल्व देश केर राजा द्युमत्सेन जिनकर राज्य कियो छीन लेने छलन्हि, तिनकर पुत्र सत्यवान केँ देखिकय सावित्री पतिक रूप मे हुनके वरण केली। कहल जाइछ जे साल्व देश पूर्वी राजस्थान या अलवर अंचल केर आसपास छल। सत्यवान अल्पायु छलाह। ओ वेद ज्ञाता छलाह। नारद मुनि सावित्री संग भेट करैत सत्यवान सँ विवाह नहि करबाक सलाह देलनि लेकिन सावित्री सत्यवानहि संग विवाह रचेली। पति केर मृत्युक तिथि मे जखन किछुए दिन बाकी रहल छल तऽ सावित्री कठोर तपस्या सेहो केली, जेकर फल हुनका बाद मे भेटलनि।   

सावित्री और सत्यवान केर कथा मे एहि बातक चर्चा भेटैत छैक जे जखन यमराज सत्यवान केर प्राण लैत जाय लगला तखन सावित्री सेहो यमराजक पाछु-पाछु चलय लगली। यमराज सावित्री केँ एना पाछु अयबा सँ रोकलनि, ताहि लेल ओ सावित्री केँ तीन टा वरदान सेहो देलनि। एक वरदान मे सावित्री मांगली कि ओ सौ पुत्र केर माता बनथि। यमराज कहलनि जे ‘एहिना होयत’। एकर बाद सावित्री यमराज सँ कहली कि हम पतिव्रता स्त्री छी और बिना पतिक संतान कोना संभव हेतैक। सावित्रीक बात सुनिकय यमराज केँ अपन गलती बुझय मे आबि गेलनि। ओ गलती सँ सत्यवान केर प्राण वापस करबाक वरदान दय चुकल छलाह। एकर बाद यमराज चनाक रूप मे सत्यवानक प्राण सावित्री केँ सौंपि देला। सावित्री चना केँ लऽ कय सत्यवानक लाश लंग एली और चनाकेँ मुंह में राखिकय सत्यवान के मुँह मे फूंकि देली। एना केला सँ सत्यवान जीवित भऽ गेला। ताहि सँ वट सावित्री व्रत मे चनाक प्रसाद चढ़ेबाक नियम अछि। जखन सावित्री पतिक प्राण केँ यमराजक फाँस सँ छोड़ेबाक लेल यमराजक पाछु जा रहल छलीह ताहि घड़ी वट वृक्ष सत्यवानक मृत-शरीर केर देख-रेख केने छल। पतिक प्राण सहित वापस अयला पर सावित्री वट वृक्ष केर आभार व्यक्त करबाक लेल ओकर परिक्रमा कयली ताहि सँ वट सावित्री व्रत मे वृक्ष केर परिक्रमा करबाक सेहो नियम अछि।

 आखिर कौन हैं भगवान परशुराम ?.


दरअसल, भगवान परशुराम को विष्णु भगवान का छठा अवतार माना जाता है. भगवान परशुराम का जन्म सतयुग और त्रेता के संधिकाल में करीब 5142 वि.पू. में वैशाख माह के शुक्ल पक्ष की तृतीया को हुआ माना जाता है. वह ऋषि जमदग्नि और रेणुका की संतान थे. परशुराम समेत ऋषि के पांच पुत्र थे. माना जाता है कि उनका जन्म वर्तमान में यूपी के बलिया के खैराडीह में हुआ था. इस संबंध में पुरातात्विक साक्ष्य भी प्रस्तुत किए जाते हैं.   


 दूसरी मान्यता ये है कि भगवान परशुराम का जन्म इंदौर के पास महू से कुछ ही दूरी पर स्थित जानापाव की पहाड़ी पर हुआ था. वहीं तीसरी मान्यता ये है कि छत्तीसगढ़ के सरगुजा जिले में घने जंगलों के बीच स्थित कलचा गांव में उनका जन्म हुआ था. वहीं, कुछ लोग यूपी के शाहजहांपुर के जलालाबाद में स्थित जमदग्नि आश्रम से करीब दो किलोमीटर पूर्व दिशा में स्थित हजारों साल पुराने मन्दिर को भगवान परशुराम की जन्मस्थली मानते हैं.


परशुराम ने शास्त्रों की शिक्षा अपने दादा ऋचीक और पिता जमदग्नि से ग्रहण की थी. वहीं, शस्त्र चलाने की शिक्षा राजर्षि विश्वामित्र से ग्रहण की. परशुराम भगवान योग, वेद और नीति में पारंगत थे.


मान्यता है कि भगवान परशुराम ने 21 बार धरती क्षत्रियों से मुक्त कर दिया. हालांकि, यह धारणा गलत बताई जाती है. जानकारी के मुताबिक जिन राजाओं से परशुराम का युद्ध हुआ उनमें हैहयवंशी राजा सहस्त्रार्जुन इनके सगे मौसा थे. परशुराम के पिता जमदग्नि का राजा सहस्त्रार्जुन से कई बातों को लेकर विवाद था. बताया जाता है कि हैहयवंशियों का राजा सहस्रबाहु अर्जुन भार्गव आश्रमों के ऋषियों को सताया करता था. ये विवाद इतना बढ़ा कि सहस्रबाहु के पुत्रों ने जमदग्नि के आश्रम की कामधेनु गाय को कब्जा लिया. साथ ही परशुराम पिता का भी वध कर दिया. इसके बाद परशुराम ने बदला लेने की कसम खाई. जिसके बाद परशुराम ने 36 बार युद्ध किया और हैहयवंशियों का नाश किया. इसीलिए क्षत्रियों के नाश की मान्यता पड़ी.

भगवान परशुराम चिरंजीवी हैं. उन्होंने कठिन तप किया जिसके बाद भगवान विष्णु ने उन्हें चिरंजीव होने का वरदान दिया. माना जाता है कि वे कल्प के अंत तक पृथ्वी पर ही तपस्यारत रहेंगे.


 मिथिला के खान पान  



1. चूड़ा दही।  

खाने, सौंदर्य स्वाद और समुदाय के जातीय प्रतिनिधित्व के बीच एक संभावित सामान्य आधार क्या हो सकता है? जोड़ने के लिए, मैथिल समुदाय के अब तक के सांस्कृतिक इतिहास में स्वाद और खाने की आदतों के गैस्ट्रोनॉमिकल खाते का एक बड़ा अभाव है। मैथिल समुदाय को लोकप्रिय रूप से भोजन के एक विशिष्ट सौंदर्यशास्त्र, अद्वितीय मैथिल भोजन में गहन रूप से निवेश करने के लिए माना जाता है। इस समुदाय के उपवास और दावत के आसपास मौखिक खातों, नुस्खे, निषेध, मानदंड, रीति-रिवाजों, अनुष्ठानों का एक बड़ा निकाय है।


भोजन को एक पवित्र व्यवसाय रखने में वास्तु संबंधी विचार भी हैं जो कि चिनबार चिंबार (पूजा और भोजन को एक ही कोने में अत्यधिक भोजन स्वच्छता बनाए रखने के लिए) की अवधारणा में देखा जा सकता है। एक विशिष्ट पहचान और सौंदर्यशास्त्र है जो विस्तृत, जटिल खाद्य व्यंजनों, शाकाहारी और मांसाहारी किस्मों के उपभोग पैटर्न के साथ इस खाद्य जागरूक समुदाय के लंबे समय तक विकसित और पोषित है।

यह अनूठा समुदाय शाक्त-शैव-वैष्णव के अनुयायी होने की प्रतिष्ठा का भी आनंद लेता है, कम से कम प्रयास के साथ और इस बहुवचन विश्वदृष्टि का गैस्ट्रोनॉमिकल उलझाव तेजी से भूमिका उलटने में हस्तक्षेप नहीं करता है। इसलिए मैथिल व्यंजन अपने सांस्कृतिक परिदृश्य का पता लगाने में एक विशेष स्थान रखता है। आइए कुछ प्रमुख, निर्विवाद मैथिल व्यंजनों से शुरू करते हैं:


चूड़ा-दहीमैथिल नामक कृषि, जलीय समुदाय का एक आम आदमी का आहार है। बिना तेल, बिना मसाले के चपटे चावल, दही और चीनी के भोजन के अपने स्पष्ट स्वास्थ्य लाभ हैं। यह एक लिंग तटस्थ भोजन है क्योंकि इस विनम्र भोजन को तैयार करने या एक साथ रखने के लिए इस क्षेत्र की महिलाओं को आम तौर पर सौंपे गए विस्तृत रसोई श्रम के साथ किसी विशेष लिंग के पाक कौशल की आवश्यकता नहीं होती है। दैनिक कम रखरखाव वाला आहार होने के अलावा इसमें पाचन मूल्य भी बहुत अच्छा होता है। यह मैथिल के कई स्वदेशी अनुष्ठानों में एक विशेष स्थान पाता है जैसे कि जितिया (बच्चों की भलाई के लिए महिलाओं द्वारा मनाया जाने वाला एक कठोर उपवास), नवन्न (नवन्न- ताजा धान का आगमन) टीला संक्रांति (टीला संक्रांति- एक त्योहार जिसे शिफ्ट करने के लिए सौंपा गया है) सौर गति में)। इसका मैथिल अनुष्ठान के साथ दिलचस्प संबंध है जैसे कि समा चकबा (समा-चकेबा भाई-बहन के बंधन का जश्न मनाने का त्योहार) दुर्गापूजा और द्वैरागमन (माता-पिता के घर से बेटी के प्रस्थान की दूसरी शादी की रस्म) क्योंकि बेटी और देवताओं को समान रूप से इस भोजन को एक संकेत के रूप में खिलाया जाता है। मीठे प्रसाद के साथ अलविदा कहना। आम तौर पर इस भोजन को क्षेत्र से ब्राह्मण जाति के साथ एक लोकप्रिय जुड़ाव सौंपा जाता है!

2.बंगाली सभयता से प्रभावित हो के यहाँ मच।मछली खाने की भी परम्परा है और प्रसिद्ध भी.

3.पान और मखाना कहल जैत की पान और माखन स्वर्ग में भी नहीं मिलाते स्वर्ग में नहीं मिलता है.